Wednesday, 24 February 2021

शब्द...

 शब्द-शब्द बहू अंतरा, शब्द के हाथ न पांव।

एक शब्द करें औषधि, एक शब्द करे घाव...

शब्द संभाले बोलिए, शब्द खींचते ध्यान।

शब्द मन घायल करे, शब्द बढ़ाते मान...

शब्द मुंह से छूट गया, शब्द ना वापस आया।

शब्द जो हो प्यार भरा, शब्द ही मन में समाई..

Friday, 1 May 2020

मेरी युविका है वो...


घर के हर कोने में
अपनी किलकारियाँ बिखेरती है जो
अपनी आवाज़ की मधुर छनकर से
अपनी मौजूदगी का एहसास कराती है वो
घर में सबकी लाडली है जो
मेरी युविका है वो
जब भी खिलखिलाकर मुस्कुराती है
मानो हर और खुशियां बिखेर जाती है
हर काम-काज में छोटे - छोटे  हाथ बंटाती है जो
अपने आंसूओ को अक्सर हर बात में लाती है वो
मेरी खुशी और मेरी शान का हिस्सा है जो
मेरी प्यारी युविका है वो
दूर हो या पास मुझे पापा कहती है जो
मेरी प्यारी युविका है वो
मेरे बीते हुए बचपन को गुदगुदाती है जो
दिल के रिश्ते को जोड़कर बांधे रखती है वो
अपने पैरों पर खड़े होकर
सब कुछ कर लेना चाहती है वो
मेरी प्यारी युविका है वो.
कभी दादी, कभी बाबा तो कभी नानी
इन नखरों के साथ रोज़ नींद लेती है वो
मेरी प्यारी युविका है वो
मामा संग रोती भी है खेलती भी है वो
कभी मम्मी - मम्मी कह कर कभी प्यार से
अपनी रूठी माँ को मानती है जो
मेरी प्यारी युविका है वो

Thursday, 10 May 2018

कृष्णा तू तो अब साहब बन गया....

हर भोला भाला इंसान  खुराक बन गया जनाब! जमाना चालाक बन गया है
शरीफ को कोई कैसे जीने देगा, बदमाश! जो उस्ताद बन गया है l
हिन्दू से मुसलमान तो लड़ेगा, राम का रहीम से जो तलाक बन गया है  l
गरीब को देखकर शहर को बू आती है, क्यूँ ये भूखा शहर का भिखारी  बन गया है l
बांटते रहो लोगो को  धर्म और जात पर, इलेक्शन अबके भी ख़ास बन गया है l
अब कौन करें फैसला इन मसलों का, जो भी चुना गया वहीं सरताज़ बन गया है l
वाह रे कृष्णा तू तो अब साहब बन गया , क्योकि ज़माना चालाक बन गया है l

आपका ,
कृष्णा नन्द राय 

सोचिए एक बार..

घर का पड़ोसी अपनी बच्ची को अब आपके घर अकेले भेजते हुए कई बार सोचता है, बस में आपकी बगल की सीट पर मजबूरी से बैठी लड़की या औरत बस में एक छोटा सा झटका लगने से उसे गलती से छू जाने पर आधी सीट से ज्यादा का फासला कर के बैठती है और चोरी से आपकी आँखों में देखती है, कहीं वहशीपन का किड़ा तो नहीं बजबजा रहा.....
फेसबुक पर आपकी रिक्वेस्ट को लड़कियों द्वारा नकार दिया जाता है, ये सोच कर की आप उसका बलात्कार ही करोगे मैसेज में.....
आप किसी छोटी अंजान बच्ची को दुलार भी नही सकते खुलकर, यहाँ तक की हो सकता है आपके घर में भी आप पर शक्क कर लिया जाता हो......
माफ करिएगा पर यही तो होता है हर जगह और जो ऐसा करते हैं उनका करना जायज़ है।
कौन अपनी बच्ची का बेरहमी से बलात्कार होने दे और फिर न्याय के लिये कोर्ट के चक्कर काटे....
कौन रातों रात अखबार की सुर्खियों में अपनी और अपनी बच्ची की लुटती हुई इज़्जत देख कर तिल तिल मरे.....
पर मैं जानता हूँ आप इज़्जत करते हैं औरत की, पर इन सब घटनाओं के दौरान आपकी आत्मा कितनी दुखती है कोई समझ तक नही सकता बस इन वहशियों की वजह से आप भी उसी नज़र से देखे जाते हैं.....
अगर आपके साथ कोई बाप अपनी बेटी भेज कर सहज महसूस करता है तो आप समझिए आपने बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है।
अगर आपकी दोस्त आप पर भरोसा कर रही है तो आप इस घिनौने समाज से हट कर हैं।
अगर फेसबुक का कोई अंजाना चेहरा आपकी इज्ज़त कर रहा है बिना डरे सब कह दे रहा है तो आपकी सोच वाकई में अच्छी है.....
अगर आपकी बहन जो एक लड़की है का दिल कह देता है के उसका भाई बहुत अच्छी सोच रखता है तो उसके यकीन को टूटने ना दें....
समाज का भार आपके कन्धों पर है ना चाहते हुए भी, मोहल्ले में भीषण आग लगी है तो आपका घर सुरक्षित रह जाए संभव नही इसलिये वो आग किसी और के ही घर क्यों ना लगी हो बुझाना आपका फर्ज़ बनता है....
ये बस फर्ज़ी बातें या एक ब्लॉग  ही नही ये बातें हैं जो आज कल हो रही है l
फर्क नही पड़ता आप ब्लॉग  को पसंद  करें या ना करें ज्ञान बाटें या ना बाटें, फर्क पड़ता है तो बस ये के मेरी बातों को समझने की कोशिश करें और अगर पहले से समझते हैं तो सलाम है आपकी सोच को..!
यह सिर्फ मुद्दा नहीं है ये सबका मुद्दा है, पर हाँ सोच मेरी है, हो सकता है आपकी भी येही सोच हो , और यदि आपकी सोच नहीं है तो सोचिए एक बार l

आपका ,
कृष्णा नन्द राय

चेहरे पर मुस्कान मत खोजो

हर एक चेहरे पर मुस्कान मत खोजो, किसी के नसीब का अंजाम मत खोजो।
डूब चुका है जो गंदगी के दलदल में, रहने दो यारो उसमें ईमान मत खोजो।
फंस गया है जो मजबूरियों की क़ैद में, उसके दिल में दबे अरमान मत खोजो।
जो पराया था आज अपना है तो अच्छा, उसमें अब वो पुराने इल्ज़ाम मत खोजो।
आदमी बस आदमी है इतना समझ लो, हर किसी में अपना भगवान मत खोजो।
ये इंसान तो ऐबों का खज़ाना है , उसके दिल से कोई, रहमान मत खोजो....

आपका ,
कृष्णा नन्द राय

ब्लॉग पे वापसी !!!!!

2 साल के बाद फिर आज अपने ब्लॉग पे लौटा हूँ , बहुत कुछ था मन में लिखने के लिए पर एक पारिवारिक जीवन और नौकरी की भाग दौड़ में समय  नहीं मिल पाता था l  शादी के बाद जीवन में बहुत कुछ बदल गया है , और एक प्यारी सी गुडिया भी अब जीवन में आ चुकी है | युविका नाम है मेरी गुडिया का , बहुत प्यारी बेटी है , पर अपने हक़ भर शैतानी भी कर लेती है l इतना तो हक़ सब बच्चो को होता ही , न भी हो तो बच्चे अपना हक़ शैतानी का और प्यार का ले ही लेते है | कभी फिर किसी दुसरे ब्लॉग पे अपनी गुडिया के बारे में लिखूंगा | 
इन 2 सालों में राजनीति से लेकर समाज तक  बहुत कुछ बदला है इस देश में | मेरा मुद्दा मेरी सोच लिख नहीं पता था , पर खबरों पे मेरा ध्यान रहता था और सोच भी रखता था सब मुद्दों पे | 
अब फिर अपना ब्लॉग मेरा मुद्दा मेरी सोच पे ब्लॉग लिखूंगा | यह ब्लॉग मेरे वापसी पे था | मेरा मुद्दा मेरी सोच से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद् |

आपका ,
 कृष्णा नन्द राय

Saturday, 16 April 2016

एक बेटी का दर्द

बेटी बनकर आई हूँ, माँ बाप के जीवन में, बसेरा होगा कल मेरा.किसी और के आंगन में...
क्यों ये रीत, रब ने बनाई होगी, कहते हैं.आज नहीं तो कल तू पराई होगी..!! देकर जनम पाल पोस कर.जिसने हमें बड़ा किया,और वक्त आया.तो उन्हीं हाथों ने हमें विदा किया..टूट कर बिखर जाती है, हमारी जिंदगी वहीं, पर फिर भी उस बंधन में..प्यार मिले जरूरी तो नहीं..क्यों रिश्ता हमारा.इतना अजीब होता है,क्या बस यही, बेटियों का नसीब होता है.....

नोट:- ये मेरा खुद का लिखा हुआ लेख नहीं है, किसी बेटी की आप बीती सुनी और लिखा।।।

एक अजनबी लड़की ( बेटी )  

Thursday, 19 November 2015

प्रधानमंत्री जी को दुखियारी भैंस का खुला ख़त


 
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सेवा में,
माननीय  प्रधानमंत्री जी,
7 RCR रोड
सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं ना आज़म खां की भैंस हूं और ना लालू यादव की! ना मैं कभी रामपुर गयी ना पटना! मेरा उनकी भैंसों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।यह सब मैं इसलिये बता रही हूं कि कहीं आप मुझे विरोधी पक्ष की भैंस ना समझे लें।
मैं तो भारत के करोड़ों इंसानों की तरह आपकी बहुत बड़ी फ़ैन हूं। जब आपकी सरकार बनी तो जानवरों में सबसे ज़्यादा ख़ुशी हम भैंसों को ही हुई थी। हमें लगा कि ‘अच्छे दिन’ सबसे पहले हमारे ही आयेंगे।लेकिन हुआ एकदम उल्टा! आपके राज में तो हमारी और भी दुर्दशा हो गयी। अब तो जिसे देखो वही गाय की तारीफ़ करने में लगा हुआ है। कोई उसे माता बता रहा है तो कोई बहन! अगर गाय माता है तो हम भी तो आपकी चाची, ताई, मौसी, बुआ कुछ लगती ही होंगी! हम सब समझती हैं। हम अभागनों का रंग काला है ना! इसीलिये आप इंसान लोग हमेशा हमें ज़लील करते रहते हो और गाय को सर पे चढ़ाते रहते हो! आप किस-किस तरह से हम भैंसों का अपमान करते हो, उसकी मिसाल देखिये। आपका काम बिगड़ता है अपनी ग़लती से और टारगेट करते हो हमें कि
देखो गयी भैंस पानी में गाय को क्यूं नहीं भेजते पानी में! वो महारानी क्या पानी में गल जायेगी? आप लोगों में जितने भी लालू लल्लू हैं, उन सबको भी हमेशा हमारे नाम पर ही गाली दी जाती है काला अक्षर भैंस बराबर माना कि हम अनपढ़ हैं, लेकिन गाय ने क्या पीएचडी की हुई है? जब आपमें से कोई किसी की बात नहीं सुनता, तब भी हमेशा यही बोलते हो कि भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फ़ायदा! आपसे कोई कह के मर गया था कि हमारे आगे बीन बजाओ? बजा लो अपनी उसी प्यारी गाय के आगे! अगर आपकी कोई औरत फैलकर मोटी  हो जाये तो उसे भी हमेशा हमसे ही कंपेयर करोगे कि भैंस की तरह मोटी हो गयी हो करीना; कैटरीना गाय और डॉली बिंद्रा भैंस! वाह जी वाह! गाली-गलौच करो आप और नाम बदनाम करो हमारा कि भैंस पूंछ उठायेगी तो गोबर ही करेगी हम गोबर करती हैं तो गाय क्या हलवा करती है? अपनी चहेती गाय की मिसाल आप सिर्फ़ तब देते हो, जब आपको किसी की तारीफ़ करनी होती है- वो तो बेचारा गाय की तरह सीधा है, या- अजी, वो तो राम जी की गाय है! तो गाय तो हो गयी राम जी की और हम हो गये लालू जी के! वाह रे इंसान! ये हाल तो तब है, जब आप में से ज़्यादातर लोग हम भैंसों का दूध पीकर ही पहलवान  बने घूम रहे हैं।
उस दूध का क़र्ज़ चुकाना तो दूर, उल्टे हमें बेइज़्ज़त करते हैं! आपकी चहेती गायों की संख्या तो हमारे मुक़ाबले कुछ भी नहीं हैं। फिर भी, मेजोरिटी में होते हुए भी हमारे साथ ऐसा सलूक हो रहा है! प्रधानमंत्री जी, आप तो मेजोरिटी के हिमायती हो, फिर हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यूं होने दे रहे हो?
प्लीज़ कुछ करो! आपके ‘कुछ’ करने के इंतज़ार में – 
आपकी एक तुच्छ प्रशंसक!
भैंस समुदाय 

Wednesday, 21 October 2015

रावण भी हो जाए...

इस समय लोग रावण भी हो जाए  वही बहुत हैं।रावण बनना भी कहां आसान रावण में अहंकार था तो पश्चाताप भी था। रावण में वासना थी तो संयम भी था। रावण में सीता के अपहरण की ताकत थी तो बिना सहमति परस्त्री को स्पर्श भी न करने का संकल्प भी था.. सीता जीवित मिली ये राम की ही ताकत थी पर
सीता पवित्र मिली ये रावण की भी मर्यादा थी....

आपका 
कृष्णा नन्द राय 

Tuesday, 20 October 2015

कभी - कभी......



बस कलम मेरी खामोश हो जाती हैं
कभी-कभी 
मैं मूक हो जाता हूँ कुछ अहम से मुद्दों पे
कभी-कभी 
मेरी आवाज़ उठती नहीं खिलाफ तेरे
नजाने क्यूं मैं कुछ बोलता नहीं 
तेरी गलतियाँ हर रोज़ बढ़ती है
करवटें लेती हैं और मैं
मैं खुद में सिमटता रहता हूँ 
थोड़ा-थोड़ा सा ही मगर टूटता रहता हूँ 
कभी-कभी होता हैं ऐसा क्यूं 
मैं देखता रहता हूँ समझता रहता हूँ
फिर सब नज़र-अंदाज करकें
खामोश हो जाता हूँ
इक प्रतिउत्तर में मुन्तजिर लोग भी हैं
मैं यूं ही तेरे कारण सुनता जाता हूँ
बोलू भी तो क्या बोलू 
ये बिकी-बंधी जुबान अब कहाँ तक खोलू
इसलिए होता हैं ऐसा
बस कलम मेरी खामोश हो जाती हैं
कभी-कभी 
मैं मूक हो जाता हूँ कुछ अहम से मुद्दों पे
कभी - कभी......

आपका,
कृष्णा नन्द राय 

Monday, 24 August 2015

फेसबुक से बात....




प्रिय फेसबुक उर्फ़ चेहरे की किताब ,
कौन पिछले जन्म  में शहंशाह था कौन मंत्री था, कौन ऋतिक रौशन की तरह दीखता है कौन कटरीना कैफ़ की तरह दीखता है, कौन कब मरेगा कैसे मरेगा , किससे शादी होगी , जब तुम सब जानते हो तो क्या तुम्हे ये नहीं पता जो आदमी पिछले कुछ घंटो से तुम्हे चला रहा है वो फेक आईडी है ? फेकू और पपु बन जाते है असली वाले फेकू - पपु नहीं असली वाले तो तुम्हे चालते ही नहीं है पता नहीं क्यों ? जब की तुम्हारे  मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग एक को बहुत फॉलो करते है किसे ये नहीं बताऊंगा क्योकि उनके चमचे बहुत है मुझे गाली देंगे, मुझे दलाल बना देंगे फेकू वाले पपु का दलाल कहेंगे और पपु वाले फेकू का दलाल कहेंगे। अब और सुनो  एक शादीशुदा आदमी जो दो घंटे से हर लड़की की पोस्ट पर ' यू आर लुकिंग हॉट ' लिख रहा है ? चार - चार गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड  रखने वाले  लड़के - लड़की  भी रिलेशनशिप सिंगल लिख रहे  है, क्या तुम उन्हें नहीं बता सकते की सुधर जाओ..? बस भी करो अब। लेकिन नहीं तुम तो कुछ लोगो के घर बिगाड़ने के मिशन पर निकले हो, जिस आदमी को मोहल्ले की रामलीला में जामवंत या ताड़िका का रोले नहीं मिलता उसे तुम फेसबुक पर आमिर खान , प्रियंका चोपड़ा जैसा बता कर उसे घर से भगाओगे क्या ? कम  से कम  ये तो सोच लो की उसके पीछे से उसके पिताजी की दुकान कौन संभालेगा ? और तो और फेसबुक हम जैसे  लोग जो स्टेटस लिखते रहते है बिना मतलब के बड़े ज्ञानी बनते है हमे भी बोलो न फेसबुक ज्ञान के लिए नहीं चैट के लिए, इतना ज्ञान बाटना है तो टीचर बन जाओ कही , क्यों नहीं बोलते तुम ये सब , देखो तुमने नहीं बोला तो मुझे बोलना पड़ा। एक  एक बात और  तुम्हारा हिंदी का नाम "चेहरे की किताब" कैसा लगा ?
 "खैर छोड़ो माफ़ करना मुझे ज्यादा ज्ञान देने क लिए "
तुम्हारा फेसबुक यूजर,
कृष्णा नन्द राय 

Friday, 14 August 2015

कभी न रोने वाला बापू, फूट फूट कर रोया है......



कन्यादान हुआ जब पूरा,
आया समय विदाई का.....
हँसी ख़ुशी सब काम हुआ था,
सारी रस्म अदाई का...
बेटी के उस कातर स्वर ने,
बाबुल को झकझोर दिया
 पूछ रही थी पापा तुमने,
क्या सचमुच में छोड़ दिया...
अपने आँगन की फुलवारी,
मुझको सदा कहा तुमने.....
मेरे रोने को पल भर भी ,
बिल्कुल नहीं सहा तुमने....
क्या इस आँगन के कोने में,
मेरा कुछ स्थान नहीं....
अब मेरे रोने का पापा,
तुमको बिल्कुल ध्यान नहीं....
देखो अन्तिम बार देहरी,
लोग मुझे पुजवाते हैं....
आकर के पापा क्यों इनको,
आप नहीं धमकाते हैं....
नहीं रोकते चाचा ताऊ,
भैया से भी आस नहीं....
ऐसी भी क्या निष्ठुरता है,
कोई आता पास नहीं.....
बेटी की बातों को सुन के ,
पिता नहीं रह सका खड़ा....
उमड़ पड़े आँखों से आँसू,
बदहवास सा दौड़ पड़ा...
कातर बछिया सी वह बेटी,
लिपट पिता से रोती थी...
जैसे यादों के अक्षर वह,
अश्रु बिंदु से धोती थी ...
माँ को लगा गोद से कोई,
मानो सब कुछ छीन चला....
फूल सभी घर की फुलवारी से.
कोई ज्यों बीन चला...
छोटा भाई भी कोने में,
बैठा बैठा सुबक रहा ...
उसको कौन करेगा चुप अब,
वह कोने में दुबक रहा..
बेटी के जाने पर घर ने,
जाने क्या क्या खोया है...
कभी न रोने वाला बापू,
फूट फूट कर रोया है........
शब्दों में लिखते- लिखते 
कृष्णा भी रोया है,
राजनिति पे लिखने वाला ब्लॉगर 
इस मुद्दे पे भी लिखा है... 
कभी न रोने वाला बापू 
फूट - फूट के रोया है..... 

प्रेषक 
एक मूकदर्शक 

Friday, 10 July 2015

उतार देंगे लाल बत्ती....

कुछ अजीब सा मेरे मुल्क का अब मौसम हो गया है, उनकी ज़रा सी चोट पर सारे मिडिया को गम हो गया है किसी के घर की रौशनी बुझी, उसका जिक्र नहीं करेंगे, हेमा को जरा सी चोट क्या लगी सबको जख्म हो गया है प्यारी सी गुड़िया चली गयी किसी की लापरवाही से उसकी परवाह नहीं लगता है मुल्क में इंसान कम हो गया है हेमा से ऐसे मिलने जा रहे हैं सारे के सारे रहनुमा जैसे टुट गया हो पहाड़, इन पर कोई सितम हो गया है उस माँ की चिंता भी कर लो बेगैरतो जिसक गुड़िया चली गयी !!! उतार देंगे अगले चुनाव में अगर लाल बत्ती का ज्यादा अहम हो गया है, ये मत भूलना की जनता जनार्दन हम है........

प्रेषक
जनता की आवाज़

Friday, 3 July 2015

बेटी हमारी वजह से होती है, औरत की क्या गलती ?

X क्रोमोज़ोम ने Y से मुह मोड़ लिया और उदास बैठा हुआ था, Y ने X के कंधे पर हाथ रखा और पूछा "क्या बात हो गयी यार X?आज से पहले तुझे कभी इतना परेशान नहीं देखा X बोला "यार Yहैं तो हम दोनों ही पुरुष के अंदर ,परन्तु जब तू स्त्री के X के साथ जा कर मिलता हैतो पुत्र उत्पन्न होता है, लोग ख़ुशी मनाते हैं, मिठाइयाँ बाटते हैं और जब मैं X के साथ मिलता हूँ तो मायूसी छा जाती है और लोग तब तक प्रयासरत रहते हैं जब तक तू जा कर X से नहीं मिल जाता.. मुझे तुझसे ईर्ष्या हो रही है और खुद के होने पर अपराधबोध..."पुत्र या पुत्री होने के निर्णायक हम दोनों ही हैं  परन्तु सारा समाज स्त्री को ही दोषी मानता है, अब तो मुझसे ये कन्या भ्रूण की चीत्कार "मुझे जीने दो ,मुझे जीने दो" नहीं सुनी जाती... गलती मेरी होती है बेसगरी बेटियो को मार जाता है आखिर क्यों ? उनको मारने से पहले या एक औरत को कोसने से पहले खुद की भी जांच करा लीजिए.....

आपका,
अपना  क्रोमोज़ोम जिन

Tuesday, 26 May 2015

मोदी जी को पत्र....



सेवा में,
श्रीमान c
PMO Delhi, 7 RCR
विषय- गरीबी और पाखण्ड दूर करने का उपाय ।

मोदी जी,
मैं रोज टीवी पर कुछ प्रचार  देखता हूँ कि ये माला/ताबीज गले में पहनो
गरीबी दूर होगी । लाल किताब में आपका सुखद भविष्य है । हनुमान कवच लाओ
सभी दुःख दूर हो जायेंगे। लक्ष्मी यन्त्र घर में मंगाव घर में रुपयो की
कोई कमी नही होगी। बिजनेस अच्छा चलेगा और भी फलाना ढिमका, तो PM साहेब
आपसे निवेदन है कि एक बार इन्वेस्ट करके सभी को ये यन्त्र वगेहरा बटवा
दो, बस कुछ ही दिनों में भारत के लोगो की गरीबी दूर हो जायेगी। लोग
आत्महत्या नही करेंगे। और आपको कुछ भी खाना या अन्य चीजे फ्री में नही
बाटना पड़ेगा। और देश का सारा खर्चा बचेगा। अगर आपको लगता है कि ये सब
बकवास है तो कृपा करके टीवी पे आने वाले पाखण्डी/फेक प्रचार को बन्द
करवाये।
धन्यवाद
भवदीय,
देश का एक आम नागरिक

Monday, 13 April 2015

क्या ये चार पंक्ति मोदी जी के लिये सही है...


हे भारत के मुखिया मोदी , ये ब्लॉगर बेशक प्रशशंक  तुम्हारा है
पर अपने मन के भीतर, उठते प्रश्नों से हारा है
मेरे सारे मित्र मुझे , मोदी का भक्त बताते हैं
पर मुझको परवाह नही है, बेशक हंसी उड़ाते हैं
मुझे 'संविधान' ने यही सिखाया, व्यक्ति नही पर देश बड़ा
व्यक्ति आते व्यक्ति जाते , मैं विचार के साथ खड़ा
बचपन से ही मेरे मन में ,रहा गूंजता नारा है
इसीलिए तुमको कुछ कसमें ,याद दिलाना वाजिब है
मेरी आत्मा कहती है, ये प्रश्न उठाना वाजिब है
ये सौगंध तुम्हारी थी, तुम देश नही झुकने दोगे
इस माटी को वचन दिया था, देश नही मिटने दोगे
ये सौगंध उठा कर तुमने, वंदे मातरम बोला था
जिस को सुनकर दिल्ली का, सत्ता सिंहासन डोला था
आस जगी थी किरणों की, लगता था अंधकार खो जायेगा
काश्मीर की पीड़ा का , अब समाधान हो जायेगा
जाग उठे कश्मीरी पंडित, और विस्थापित जाग उठे
जो हिंसा के मारे थे , वे सब निर्वासित जाग उठे
नई दिल्ली से जम्मु तक, सब मोदी -मोदी दिखता था
कितना था अनुकूल समय, जो कभी विरोधी
दिखता था फिर ऐसी क्या बात हुई, जो तुम विश्वास हिला बैठे
जो पाकिस्तान समर्थक हैं, तुम उनसे हाथ मिला बैठे
गद्दी पर आते ही उसने, रंग बदलना शुरू किया
पहली प्रेस वार्ता से ही, जहर उगलना शुरू  किया
जिस चुनाव को खेल जान पर, सेना ने करवाया है
उस चुनाव का सेहरा उसने, पाक के सिर बंधवाया है
संविधान की उड़ा धज्जियां,अलगावी स्वर बोल दिए
जिनमें आतंकी बंद थे , वे सब दरवाजे खोल दिए
अब बोलो क्या रहा शेष,बोलो क्या मन में ठाना है
देर अगर हो गयी समझ लो,जीवन भर पछताना है
गर भारत की धरती पर,आतंकी छोड़े जायेगें
तो लखवी के मुद्दे पर, दुनिया को क्या समझायेंगे
घाटी को दरकार नही है, नेहरू वाले खेल की
अब भी वक़्त बहुत बाकी है, अपनी भूल का सुधार करो
ये फुंसी नासूर बने ना, जल्दी से उपचार करो
जिस शिव की नगरी से  जीते,उस शिव का तुम कुछ ध्यान करो
इस मंथन से विष निकला है, आगे बढ़ कर पान करो
गर मैं हूं प्रशशंक तुम्हारा तो, अधिकार मुझे है लड़ने का
नही इरादा है कोई, अपमान तुम्हारा करने का
केवल याद दिलाना तुमको, वही पुराना नारा है
हिन्दू, इस्लाम , सिख, ईसाई इन सब धर्मो से भारत से 
हमारा है।

आपका,
कृष्णा नन्द राय

Monday, 6 April 2015

जब भी अपने कमरे में लौट कर आता हूँ...


एक ब्लॉग अपने कमरे के ऊपर बहुत दिन से बोल रहा था कब लिखोगे मेरे बारे में ब्लॉग आज लिखा :-

घंटों बाहर रहने के बाद जब भी अपने कमरे में
लौट कर आता हूँ...
एक अपनेपन का अहसास होता है...
लगता है..
जैसे मेज़ कुर्सी बेचैनी से मेरा इंतज़ार कर रही हैं...
मेरी कलम मेरी ऊंगलियों में खेलने को बेताब दिखती है...
बिस्तर खुली बाहों से मुझे आराम करने का बुलावा देता है...
महसूस होता है
टीवी कह रहा है , अब उसे मेरा मनोरंजन करने
का मौका मिलेगा...
टयूब लाईट रोशनी से कमरे को
जगमगाने के लिए तैयार बटन दबाने के इंतज़ार में दिखती...
इतना इंतज़ार तो मेरा कोई भी नहीं करता...
कितनी भी देर के बाद कमरे में आऊँ...
कोई शिकवा शिकायत नहीं करता...
रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में
मेरे साथ मेरे कमरे के सिवाय...
ऐसा कही भी नहीं होता...
किसी ना किसी को कोई ना कोई
शिकायत मुझसे रहती है...
कभी कोई नाराज़ हो कर मुंह फुलाता है....
कभी सवालों की झड़ी लगाता है...
मन करता है कमरे से बाहर निकलूँ ही नहीं...
पर मजबूरी है...
नहीं चाहते हुए भी कुछ घंटो
कमरे को खामोशी से मेरे इंतजार में
छोड़ कर जाना पड़ता है...
मेरे कमरे से बेहतर मुझे कोई नहीं समझता...

तुम्हारा ,
कृष्णा नन्द राय 

Thursday, 12 March 2015

ऊपर बैठा वो बाजीगर..जाने क्या मन में ठाने है..

इस जीवन की चादर में,
सांसों के ताने बाने हैं,
दुख की थोड़ी सी सलवट है,
सुख के कुछ फूल सुहाने हैं,
क्यों सोचे आगे क्या होगा,
अब कल के कौन ठिकाने हैं,
ऊपर बैठा वो बाजीगर,
जाने क्या मन में ठाने है,
चाहे जितना भी जतन करें,
भरने का दामन तारों से,
झोली में वो ही आएँगे,
जो तेरे नाम के दाने है,
मत डर इस जीवन में,
बहुत सारे ठिकाने है,
प्रोडक्शन नहीं तो रिपोर्टिंग है,
जीवन में ऐसी बहुत मंजिले है,
चलते रहना है हर डगर पे,
हर रोज़ नए-नए  बहाने है
पीछे मुड़ के मत देखना
क्योकि मन के हारे - हार है
मन के जीते जीत,
झोली में वो ही आएँगे,
जो तेरे नाम के दाने है,
ऊपर बैठा वो बाजीगर,
जाने क्या मन में ठाने है...
ये सब तो ब्लॉग लिखने के बहाने है...

आपका
कृष्णा नन्द राय 

महिला दिवस पे एक नया चेहरा बनी!!!!

कभी बेटी, कभी पत्नी,
कभी माँ बनी....
न जाने एक बिटिया,
क्या क्या बनी....
कभी भाभी, कभी चाची,
कभी बहन बनी....
एक बिटिया कई परिवारोँ का,
गहना बनी....
कभी ननंद, कभी जेठानी,
कभी देवरानी बनी....
अपने घर मेँ ही वो,
भूली हुयी कहानी बनी....
कभी सास, कभी दादी,
कभी नानी बनी....
उम्र के हर पड़ाव मेँ,
बस एक कुर्बानी बनी....
कभी शारदा, कभी लक्ष्मी,
कभी काली बनी....
हर रुप मेँ इस जगत की,
पालनहारी बनी....
कभी दुर्गा, कभी अवन्ति,
कभी लक्ष्मीबाई बनी....
हर युग मेँ वो,
नये इतिहास की रोशनाई बनी
कभी सोनिआ, कभी प्रतिभा तो कभी किरण बनी
भारत में महिला दिवस पे एक नया  चेहरा बनी

आपका,
कृष्णा नन्द राय 

Thursday, 19 February 2015

बिहार अधूरा ब्लॉग

दिल्ली का दंगल खत्म हुआ ही था की समय से पहले बिहार का बिगुल बज गया, बिहार में उठा पटक का दौर भी शुरू  हो चुका  है, पर इस मुक़ाबला में झाडू दूर-दूर तक नहीं है, यहाँ पे कमल की लड़ाई तीर कमान और लालटेन से होगा ऐसा नहीं है की पंजा न हो, बिना पंजा के कोई काम हो सकता है क्या नहीं न..? मैं चुनावी वाले पंजे की बात कर रहा हूँ न की आम आदमी के पंजे का, ये  आम आदमी पार्टी का  मत समझना!!!!! खैर जो भी हो कमल को छोड़ के वहां सब एक साथ ही मिले है, पंजा लालटेन को हाथ में लेकर तीर कमान को रौशनी दे रहा है सटीक वार करने के लिए ये वार कमल पे होगा या खुद उनके ऊपर ही ये इस ऊठा  पटक   शांत होने के बाद ही पता चलेगा, कभी तीर कमान चलने वाले मांझी जी आज खुद अपनी ही पार्टी के तीर  कमान को काट रहे है , शायद ये नितीश जी की गलती से हुआ है ऐसा नितीश जी के ही लोग सोच रहे है, या युँ  कहु तो पछता  रहे है होंगे जो भी अब क्या अब तो चिड़िया चुग  गयी खेत, मांझी जी ने नाव को ऐसे जगह रोक दिया है जहा किनारा तो है पर डरते है सब है क्योकि किनारे के पास गहराई है, नाव उलटी तो कौन - कौन जायेगा पता नहीं l पता चल जायेगा जल्दी l