Wednesday, 7 May 2014

वाराणसी में सही में सुनामी आगयी है गंगा की लहरों में...

वाराणसी में सही में सुनामी आगयी है गंगा की लहरों में... अजीबो गरीब नारे सुन रहे है और पढ़ रहे पोस्टर्स पे... नवभारत टाइम्स में कुछ नारे भी लिखे हुए है हो आज कल वाराणसी में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और बीजेपी के कार्यकर्ताओं नरेंद्र मोदी और केजरीवाल को ध्यान में रखकर बनाए हैं-

-'दिल्ली में शीला हारी हैं, अब मोदी की बारी है' नारा सीधे मोदी समर्थकों पर चोट करता है।

-'जो केजरीवाल से डरता है, दो-दो जगह से लड़ता है' नारा भी सीधे मोदी समर्थकों पर चोट करता है।

-'भ्रष्टाचार का एक ही काल, केजरीवाल!' 'भ्रष्टाचार का फैला जाल, साफ करेगा केजरीवाल' भ्रष्टाचार के खिलाफ केजरीवाल को नायक के तौर पर पेश करते हैं।

-'बाबा लड़े थे गोरों से, हम लड़ेंगे चोरों से', 'भ्रष्टाचार पे दे झाड़ू, वंशवाद पे दे झाडू', गुंडाराज पे दे झाडू' जैसे नारे भ्रष्टाचार पर पार्टी की विचारधारा को समझाने के लिए हैं।

-ठेठ बनारसी लोगों को आप को वोट के लिए प्रेरित करने के लिए वहीं की बोली में 'मारा मुहरिया तान कै, झाड़ू केरि निशान पै' नारा दिया जा रहा है।

-'चाहे मामा हो या भांजा, जीजा हो या साड़ू, सब पर भारी पड़ने वाली है, आम आदमी की झाड़ू' नारा वंशवाद के खिलाफ दिया जा रहा है।

मोदी खेमे के नारेः नरेंद्र मोदी से जुड़ा सबसे लोकप्रिय नारा तो 'अबकी बार, मोदी सरकार' ही है। इसमें कार्यकर्ता किसी भी संदर्भ को फिट कर देते हैं-

-'किसानों की हो सरकार, अबकी बार मोदी की सरकार!' 'युवाओं की है ललकार, अबकी बार मोदी सरकार!'

-बात-बात में नमो-नमो! संबोधन भी प्रचार का तरीका बन गया है। नमस्ते या अयोध्या आंदोलन के 'जय श्रीराम' की तरह बीजेपी कार्यकर्ता 'नमो-नमो' से अभिवादन कर रहे हैं।

-'मोदी जी आएंगे, झाडू सहित भगाएंगे' नारा केजरीवाल समर्थकों को जवाब देने के लिए दिया जा रहा है।

-'जो लड़ न सका खांसी से, वो क्या लड़ेगा काशी से' नारा युवा कार्यकर्ता जगह-जगह लगा रहे हैं।

-'अच्छे दिन आने वाले हैं' नारा भी काफी लोकप्रिय हो रहा है। एक समर्थक सिर्फ 'अच्छे दिऩ...' बोलता है तो दूसरी ओर से आवाज आती है- 'आने वाले हैं...'

-गांव में जिन लोगों ने मोदी का नाम सुन रखा है लेकिन चुनाव निशान नहीं मालूम, उनके लिए नारा दिया गया है-'नरेंद्र मोदी जी की ये पहचान, कमल निशान!'

सौजन्य - नवभारत टाइम्स

आपका
कृष्णा नन्द राय

Monday, 5 May 2014

नारीत्व क्या गुलाम का नाम है..

नारीत्व क्या गुलाम का नाम है..
पुरुष-प्रधान इस प्रदेश में..
क्या ये बस जरूरत का नाम हैं..
चूल्हें की आग में बिछावन की रात में..
सयानों की बात में..
क्या बस ये समाज़ की बकवास में है..
सजने-सजानें में दर्द को छुपानें में..
लोरी सुनानें में गमों को सीने से लगाने में..
क्या बस जरूरत में ही याद आते है..
मक्सद के खातिर ही बनायें जाते है..
रिश्तों में बस सजाएँ जाते है..
नारी को अपनाने के ख़िस्सें बस सुनाएँ जाते है..
कैसी है चलन ये..
समाज़ की भूख में तपाएँ जाते हैं..
दर्द के आँसू में रुलाएँ जाते हैं..
ज़माने के आग में झोंक के जलाएँ जाते हैं..
सम्मान में बस दिखाएँ जाते हैं..
पता ना जमाना अब कितना पीछें चला जा रहा हैं..
नारी को समाज़ से हटाया जा रहा हैं..
नारी हैं समाज़ की नींव..
इन्हें किसी मक्सद से नहीं..
अपने दिल से जोडों..
मुहब्बत में एक लफ़्ज़ और नया जोडों..
नारी-सम्मान को एक नई मक्सद से जोडों..
शर्म आती है इस देश के नौजवानों पे
जो हर बार हर नारी को द्रौपदी और निर्भया समझते है
कर देते है चिर हरण उसका पोत देते है कालिख इस समाज पे..
बस भी कर कृष्णा ये ब्लॉग भी अब रो पड़ा है नारी के इस दर्द से...
कितना कुछ कहेगा पुरुष-प्रधान इस प्रदेश में..
समझ नहीं आता नारीत्व क्या गुलाम का नाम है.....

आपका
कृष्णा नन्द राय 

Friday, 2 May 2014

डरता है मुर्दा,कहीं कफन बिक न जाए......

बिक गई है धरती,गगन बिक न जाए,
बिक रहा है पानी,पवन बिक न जाए,
चांद पर भी बिकने लगी है जमीन.....
डर है की सुरज की तपन बिक न जाए,
हर जगह बिकने लगी स्वार्थ नीति,
डर है की कही धर्म बिक न जाए,
देकर दहेज खरीदा गया है अब दुल्हे को,
कही उसी के हाथोँ दुल्हन बिक न जाएं,
हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता,
कहीं इन्ही के हाथोँ वतन बिक न जाए,
सरेआम बिकने लगे है अब सांसद
डर है की कही संसद भवन बिक न जाए,
आदमी मरा तो भी आंखे खुली हुई है,
डरता है मुर्दा,कहीं कफन बिक न जाए......
हर तरफ़ झुटे लोग और दलालों का बोलबाला है ,
डर है की कृष्णा को भी दलाल न कहा जाए....
मेरा मुद्दा मेरी सोच कही बिक न जाए....

आपका
कृष्ण नन्द राय 

Saturday, 26 April 2014

यहाँ बात बात पर कोई नहीं लिखता...

कौन करे कोई कानूनी वादें..
कौन करे अब समाज़ी बकवासे..
जब ज़र्रा-ज़र्रा तेरे दिल का दलाली हो..
और जब आरोप प्रत्यारोप का दौर हो....
तो फ़िर कौन करे हक की बातें..!

बात पे बात कौन करें..
रात पे रात कौन जगे..
जब तु समझनें को तैयार ही ना हो..
तो फ़िर आँखें चार कौन करें..

बस नसीब नसीब  की बात है कृष्णा ..
वर्ना बात बात पे ब्लॉग कौन लिखे....

बड़ी मुद्दतोँ बाद मैँने ये कोशिश की..
तेरे नाम से लिखने  की कोशिश की..
"मेरा मुद्दा... मेरी सोच" तुझे नाम दिया
बस कृष्णा बाबू लिखते रहना
यहाँ बात बात कोई नहीं लिखता...

तुम्हारा ब्लॉगर
कृष्णा नन्द राय 

मेरा मुद्दा मेरी सोच ब्लॉग .. कृष्णा अब भारी हो चला हैं..!

सब अपने  छोड पराया कौन हैं..
तू हैं साथी तो फ़िर हराया कौन हैं..
मैं समझता नहीं क्या बातें सबकी..
कृष्णा देख सुनानें कहानी आया कौन हैं..!

मेरे पीछें करता हैं वो बातें रूख़सरी..
सामनें मेरे मेरा दीदार करता हैं..!

कैसे करता हैं वो ऐसे कारनामें..
तौबा कृष्णा बाबू  यें शातिर भी हैंरान रहता हैं..!

किसी दिन वो कर आऐगा मेरे वज़ूद का सौदा..
इश्तेहार जो मोहब्बत का मैंनें हाथ में दे रक्खा हैं..!

सोचा था इज़हार करूं मैं भी अपने दर्द का..
खामोश पन्नों को देख खामोश रह गया..!

अब फ़िर कहेंगे तुम्हारे बारे में अपने  ब्लॉग  में डाल..
मेरा मुद्दा मेरी सोच ब्लॉग ..  कृष्णा अब भारी हो चला  हैं..!

आपका
कृष्णा नन्द राय 

Thursday, 24 April 2014

वोट करवा आएं हैं हम जागीर अपने बाप की..

बेमतलब बेमकसद बेपरवाह की बात किए जा रहे हैं..
फ़िर भी सियासत में हम राज़ किए जा रहे हैं..
उलट-पुलट के हम बातों को पेश किए जा रहें हैं..
फ़िर भी दिलों में सबके घर किए जा रहें हैं..
ज़नता जनार्धन अब की ना रही कृष्णा बाबू  ..
फ़रेब पे फरेब  किए फ़िर भी हम  जीते जा रहें हैं..
दुश्मनी खुलेआम किए जा रहें हैं..
फ़िर भी डंके के चोट पे जीतेंगें हमी कहे जा रहें हैं..
और किस तरह से हम लूटें तुम्हें सोच के हँसे जा रहे हैं..
वोट करवा आएं हैं हम जागीर अपने बाप की..
हर धर्म जाती का ठेका हमने ले रखा है..
बेमतलब में तुमसे हम लुका-छिप्पी का खेल किए जा रहे हैं..
दिखा तुमसे मुहब्बत हम तेरा दिल लिए जा रहें हैं..
राष्ट्रनीति को हम राज़नीति से ज़ोड..
मज़हब के नाम खूनी खेल किए जा रहे हैं..
एक तुम्हारें रोकनें से क्या होगा कृष्णा नन्द राय ..
जब देश में हम कानूनी किए जा रहे हैं..
बेमतलब बेमकसद बेपरवाह की बात किए जा रहे हैं..
फ़िर भी सियासत में हम राज़ किएं जा रहे हैं..
कृष्णा नन्द बंद करो अपना ब्लॉग
बेमतलब तुम्हारे ब्लॉग में हम छाए जा रहे है...
फ़िर भी सियासत में हम राज़ किएं जा रहे हैं..

आपका
कृष्णा नन्द राय 

मैंनें शहर बदल दिया...

..मैंनें शहर बदल दिया पेट में आग अभी  बाकी हैं..
..जिस शहर मैं गया सुना धांधली  अभी   बाकी हैं..
..लोग शहर के सारें ज़ुल्म के सताएं हुएं हैं..
..रातों में अपराध इस शहर  में अभी   बाकी हैं..
..मैं नहीं कहता मैं हूँ दूध का धुला..
..लेकिन दिल में इंसानियत और होंठों पे नाम..
..हे राम तुम्हारा  अभी   बाकी हैं..
..सितम शहर के सारें मेरे हिस्सें वालें  अभी   बाकी हैं..
..इंतज़ार नहीं अब हर शाम की..
..नौकरी की तलाश इस शहर  अभी   बाकी हैं..
..क्या हैं बात सरकारी तो दूर..
..स्वयंचालित संस्था भी हाथ से  अभी   बाकी हैं..
..किस्मत हैं या ये राज़नीति का छलावा..
..जो युवा देश रोज़गार से  अभी   बाकी हैं..
..सारें शहर में ये किस्सें ज़ारी हैं..
..बेमतलब में लिख रहा कृष्णा नन्द राय  अभी   बाकी हैं..
..मैंनें शहर बदल दिया पेट में आग  अभी   बाकी हैं..
..जिस शहर मैं गया सुना धांधली अभी  बाकी हैं..!

आपका
कृष्णा नन्द राय